Home Ads adnowcharcha1

Google.com

Responsive Ad

मंगलवार, 10 अगस्त 2021

ओलंपिक और विश्वगुरू

0

....

टोक्यो में चल रहे ओलंपिक खेलों की मेडल टैली में कल शामतक भारत अंडर 50 में भी नहीं था! फिर सूबेदार नीरज चोपड़ा ने पूरे दम के साथ भाला फेंका और हम 67वें पोजिशन से 20 अंकों की उछाल लेकर सीधे 47वें पोजिशन पर आ गए!

एक गोल्ड मैडल और 20 अंकों की उछाल!!!

138 करोड़ की आबादी वाला देश कल से सीना फुलाए घूम रहा है! क्रेडिट लेने देने की होड़ सी मची हुई है! हर किसी में सूबेदार साहब से जुड़ने की ललक दिखाई पड़ रही है! क्योंकि उन्होंने गोल्ड दिलाया है!

138 करोड़ की आबादी में मात्र एक स्वर्ण पदक!!  क्या ये गर्व का विषय है?

पदक तालिका पर नजर डालेंगें तो आप पाएंगे कि हम कुल 14 ओलंपिक पदकों (स्वर्ण, रजत और कांस्य) के साथ 47वें स्थान पर हैं!

 ....और जो देश प्रथम (चीन-38 स्वर्ण पदक)  द्वितीय (USA-36 स्वर्ण पदक व तृतीय स्थान (जापान-27 स्वर्ण पदक) पर हैं उनके सिर्फ स्वर्ण पदकों की संख्या हमसे कुल पदकों की संख्या से लगभग दो गुनी या तिगुनी है!

शीर्ष पर बढ़त बनाये हुए इन देशों के साथ ऐसा नहीं है कि वे सिर्फ खेलों में ही अच्छा कर कर रहे हैं और बाकी क्षेत्रों में फिसड्डी हैं! 

इनकी विकास दर, औद्यिगिक तकनीक, रेलवे, हाईवे,  सैन्यशक्ति ....यहाँ तक कि शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं- कुछ भी उठा लीजिये! ये देश इन क्षेत्रों में भी हमसे कई गुना बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं!

दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय इन्ही के पास हैं!  पूरी दुनिया को बेहतर फाइटर जेट, पनडुब्बी और हवाई जहाज से मेट्रोरेल तकनीक, कंप्यूटर तकनीक और स्पेस तकनीक यही लोग मुहैया करा रहे हैं!
...और खेलों में भी इनका कोई सानी नहीं है!

इसी को सर्वांगीण विकास कहते हैं!

हम तो इनके पासंग में भी नहीं हैं! सिर्फ जनसंख्या के मामले में बढ़त बनाये हुए हैं हम!

इतने बड़े फेल्योर का जिम्मेदार किसी एक को नहीं ठहराया जा सकता! हम सब इस हमाम में नँगे हैं!

हमने कभी इन मुद्दों पर बात ही नहीं की! हम नाली, खड़ंजा, PCC रोड, वृद्धावस्था पेंशन, बेरोजगारी भत्ता, आधार, पैन, जनधन, जातिप्रमाण पत्र, आय प्रमाणपत्र, मिड डे मील में मिलने वाला अंडा, आंगनवाड़ी, भोज, भण्डारा, बोलबम, दरगाह, हिन्दू, मुसलमान, भगवा, हरा- इन्ही सब में उलझकर रह गए!

जिसका नतीजा है कि हमारी आजादी के महज दो साल पहले दो-दो परमाणु हमले झेल चुका देश आज न सिर्फ ओलंपिक की मेजबानी कर बल्कि अपनी सरजमीं पर पदक भी जीत रहा है!

...और आजादी के 74 साल बाद हमारे देश की 80 करोड़ जनता 5 किलो गेंहू के लिए लाइनों में खड़ी है! ...और ख़ुशी ख़ुशी खड़ी है! 

क्योंकि हमने न खेलों को सिरियसली लिया और न ही पढाई लिखाई और तकनीक को! जिन्होंने सिरियसली लिया वे आज हर जगह अच्छा कर रहे हैं!

इस ओलंपिक समापन के बाद हमारे खिलाडी वापस आएंगे! हर राज्य अपनी (बेशर्मी की) क्षमता के मुताबिक उनको पुरस्कृत करेगा! माननीय लोग उनके साथ फोटो खिंचवायेंगे! कुछ मनगढ़ंत कहानियां रची जाएँगी! बैनर पोस्टर बनेगा....और कुछ दिनों बाद हम सब फिर से उसी हिन्दू मुसलमान, गौरी गणेश, मुल्ला मौलवी  में उलझ जायेंगे!

लेकिन याद रखिए! खिलाड़ियों के प्रदर्शन के बदले में माननीयों द्वारा बांटे जाने वाले कैश, फ्लैट और नौकरी तथा देशवासियों द्वारा फील किया गया गर्व- ये सब दरअसल अपनी अपनी नाकामी छिपाने के तरीके हैं! इससे ज्यादा कुछ नहीं है!

...और जब तक ऐसा चलता रहेगा, विश्वगुरु सिर्फ ओलंपिक ही नहीं, हर प्रतिस्पर्धा में मेडल के लिए तरसते रहेंगे! Sabhar Facebook Wall hidu sabya samaj

Read more

शनिवार, 7 अगस्त 2021

कार्टूनिस्ट प्राण

0

चाचा चौधरी,साबू ,बिल्लू , पिंकी और रमन के अलावा मेरे जैसे अनेक जनों का ,अपने हंसाने व गुदगुदाने वाले  किरदारों के द्वारा बचपन को एक अलग ही रंगीन (रंग-बिरंगे कॉमिक्स के चित्रों द्वारा) बनाने वाले श्री प्राण कुमार शर्मा जी ,जो की विश्व भर में "कार्टूनिस्ट प्राण" के नाम से प्रसिद्ध है | आपके जैसे अनेक आर्टिस्टों व कार्टूनिस्टों ने हमें अपने अपने किरदारों के द्वारा हमारा मनोरंजन किया हैं लेकिन आपका स्थान कॉमिक्स जगत में अद्वितीय रहा हैं | आप आज हमारे बीच में नहीं है , लेकिन आपके किरदारों के द्वारा आप हमेशा से हमारे बीच मौजूद रहेंगे , किसी कमरे की किसी अलमारी में आपके किरदार सदा साथ रहेंगे 

मेरे बचपन को एक अलग आयाम देने के लिए शुक्रिया 
श्री प्राण कुमार शर्मा जी " कार्टूनिस्ट प्राण" को उनकी पुण्यतिथि पर शत् शत् नमन ❤

Read more

बुधवार, 4 अगस्त 2021

टोक्यो ओलंपिक

1

टोक्यो ओलंपिक में भारतीय पुरुष हॉकी टीम द्वारा कांस्य पदक जीतने पर सम्पूर्ण टीम को हार्दिक बधाई।
भारतीय हॉकी टीम ने नया इतिहास रचकर देशवासियों को गौरवान्वित किया है।
#Hockey 
#Olympic

Read more

टोक्यो ओलम्पिक की महान घटना

0

।।🚩 -
#टोक्यो_ओलम्पिक_की_महान_घटना 

केनिया के सुप्रसिद्ध धावक अबेल मुताई आलंपिक प्रतियोगिता मे अंतिम राउंड मे दौडते वक्त अंतिम लाइन से कुछ मिटर ही दूर थे और उनके सभी प्रतिस्पर्धी पीछे थे । अबेल ने स्वर्ण पदक लगभग जीत ही लिया था,इतनेमें कुछ गलतफहमी के कारण वे अंतिम रेखा समझकर एक मिटर पहले ही रुक गए। उनके पीछे आनेवाले #स्पेन_के_इव्हान फर्नांडिस के ध्यान मे आया कि अंतिम रेखा समझ नहीं आने की वजह से वह पहले ही रुक गए ।उसने चिल्लाकर अबेल को आगे जाने के लिए कहा लेकिन स्पेनिश नहीं समझने की वजह से वह नही हिला ।आखिर मे इव्हान ने उसे धकेलकर अंतिम रेखा तक पहूंचा दिया ।इस कारण अबेल का प्रथम तथा इव्हान का दूसरा क्रमांक आया ।पत्रकारों ने इव्हान से पूछा "तुमने ऐसा क्यों किया ?मौका मिलने के बावजूद तुमने प्रथम क्रमांक क्यों गंवाया ?" इव्हान ने कहा "मेरा सपना है कि #हम_एक_दिन_ऐसी_मानवजाति_बनाएंगे_जो_एक दूसरे को मदद करेगी ना कि उसकी भूल से फायदा उठाएगी।और मैने प्रथम क्रमांक नहीं गंवाया।" पत्रकार ने फिर कहा "लेकिन तुमने केनियन प्रतिस्पर्धी को धकेलकर आगे लाया ।" इसपर इव्हान ने कहा "वह प्रथम था ही ।यह प्रतियोगिता उसी की थी।" पत्रकार ने फिर कहा " लेकिन तुम स्वर्ण पदक जीत सकते थे" "उस जीतने का क्या अर्थ होता । मेरे पदक को सम्मान मिलता? मेरी मां ने मुझे क्या कहा होता?संस्कार एक पीढी से दूसरी पीढी तक आगे जाते रहते है ।मैने अगली पीढी को क्या दिया होता? दूसरों की दुर्बलता या अज्ञान का फायदा न उठाते हुए उनको मदद करने की सीख मेरी मां ने मुझे दी है ।" #TokyoOlympics2021 sabhar devendra Kumar Sinha Facebook wall

                     ।।🇮🇳भारत माता की जय🇮🇳।।

Read more

शिखा बन्धन (चोटी) रखने का महत्त्व

0


〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️
शिखा का महत्त्व विदेशी जान गए हिन्दू भूल गए।हिन्दू धर्म का छोटे से छोटा सिध्दांत,छोटी-से-छोटी बात भी अपनी जगह पूर्ण और कल्याणकारी हैं। छोटी सी शिखा अर्थात् चोटी भी कल्याण, विकास का साधन बनकर अपनी पूर्णता व आवश्यकता को दर्शाती हैं। शिखा का त्याग करना मानो अपने कल्याणका त्याग करना हैं। जैसे घङी के छोटे पुर्जे कीजगह बडा पुर्जा काम नहीं कर सकता क्योंकि भले वह छोटा हैं परन्तु उसकी अपनी महत्ता है। 

शिखा न रखने से हम जिस लाभ से वंचित रह जाते हैं, उसकी पूर्ति अन्य किसी साधन से नहीं हो सकती।

'हरिवंश पुराण' में एक कथा आती है हैहय व तालजंघ वंश के राजाओं ने शक, यवन, काम्बोज पारद आदि राजाओं को साथ लेकर राजा बाहू का राज्य छीन लिया। राजा बाहु अपनी पत्नी के साथ वन में चला गया। वहाँ राजा की मृत्यु हो गयी। महर्षिऔर्व ने उसकी गर्भवती पत्नी की रक्षा की और उसे अपने आश्रम में ले आये। वहाँ उसने एक पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर राजा सगर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। राजासगर ने महर्षि और्व से शस्त्र और शास्त्र विद्या सीखीं। समय पाकर राजा सगरने हैहयों को मार डाला और फिर शक, यवन, काम्बोज, पारद, आदि राजाओं को भी मारने का निश्चय किया। ये शक, यवन आदि राजा महर्षि वसिष्ठ की शरण में चले गये। महर्षि वसिष्ठ ने उन्हें कुछ शर्तों पर उन्हें अभयदान दे दिया। और सगर को आज्ञा दी कि वे उनको न मारे। राजा सगर अपनी प्रतिज्ञा भी नहीं छोङ सकते थे और महर्षि वसिष्ठ जी की आज्ञा भी नहीं टाल सकते थे। अत: उन्होंने उन राजाओं का सिर शिखा सहित मुँडवाकर उनकों छोङ दिया। 

प्राचीन काल में किसीकी शिखा काट देना मृत्युदण्ड के समान माना जाता था। बङे दुख की बात हैं कि आज हिन्दु लोग अपने हाथों से अपनी शिखा काट रहे है। यह गुलामी की पहचान हैं। 
    
शिखा हिन्दुत्व की पहचान हैं। यह आपके धर्म और संस्कृतिकी रक्षक हैं। शिखा के विशेष महत्व के कारण ही हिन्दुओं ने यवन शासन के दौरान अपनी शिखा की रक्षा के लिए सिर कटवा दिये पर शिखा नहीं कटवायी।

डा॰ हाय्वमन कहते है ''मैने कई वर्ष भारत में रहकर भारतीय संस्कृति का अध्ययन किया हैं, यहाँ के निवासी बहुत काल से चोटी रखते हैं , जिसका वर्णन वेदों में भी मिलता हैं। दक्षिण भारत में तो आधे सिर पर 'गोखुर' के समान चोटी रखते हैं । उनकी बुध्दि की विलक्षणता देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हुआ हुँ। अवश्य ही बौध्दिक विकास में चोटी बड़ी सहायता देती हैं। सिर पर चोटी रखना बढा लाभदायक हैं। मेरा तो हिन्दु धर्म में अगाध विश्वास हैं और मैं चोटी रखने का कायल हो गया हूँ । 

"प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा॰ आई॰ ई क्लार्क एम॰ डी ने कहा हैं " मैंने जबसे इस विज्ञान की खोज की हैं तब से मुझे विश्वास हो गया हैं कि हिन्दुओं का हर एक नियम विज्ञान से परिपूर्ण हैं। चोटी रखना हिन्दू धर्म ही नहीं, सुषुम्ना के केद्रों की रक्षा के लिये ऋषि-मुनियों की खोज का विलक्षण चमत्कार हैं।

"इसी प्रकार पाश्चात्य विद्वान मि॰ अर्ल थामस लिखते हैं की "सुषुम्ना की रक्षा हिन्दु लोग चोटी रखकर करते हैं जबकि अन्य देशों में लोग सिर पर लम्बे बाल रखकर या हैट पहनकर करते हैं। इन सब में चोटी रखना सबसे लाभकारी हैं। किसी भी प्रकार से सुषुम्ना की रक्षा करना जरुरी हैं।

"वास्तव में मानव-शरीर को प्रकृति ने इतना सबल बनाया हैं की वह बड़े से बड़े आघात को भी सहन करके रह जाता हैं परन्तु शरीर में कुछ ऐसे भी स्थान हैं जिन पर आघात होने से मनुष्य की तत्काल मृत्यु हो सकती हैं। इन्हें मर्म-स्थान कहाजाता हैं। 

शिखा के अधोभाग में भी मर्म-स्थान होता हैं, जिसके लिये सुश्रुताचार्य ने लिखा है मस्तकाभ्यन्तरोपरिष्टात् शिरासन्धि सन्निपातो।

रोमावर्तोऽधिपतिस्तत्रपि सद्यो मरणम्।
अर्थात् मस्तक के भीतर ऊपर जहाँ बालों का आवर्त(भँवर) होता हैं, वहाँ संपूर्ण नाङियों व संधियों का मेल हैं, उसे 'अधिपतिमर्म' कहा जाता हैं।यहाँ चोट लगने से तत्काल मृत्यु हो जाती हैं(सुश्रुत संहिता शारीरस्थानम् : ६.२८)

सुषुम्ना के मूल स्थान को 'मस्तुलिंग' कहते हैं। मस्तिष्क के साथ ज्ञानेन्द्रियों कान, नाक, जीभ, आँख आदि का संबंध हैं और कामेन्द्रियों - हाथ, पैर, गुदा, इन्द्रिय आदि का संबंध मस्तुलिंग से हैं मस्तिष्क व मस्तुलिंग जितने सामर्थ्यवान होते हैं उतनी ही ज्ञानेन्द्रियों और कामेन्द्रियों - की शक्ति बढती हैं। मस्तिष्क ठंडक चाहता हैं और मस्तुलिंग गर्मी मस्तिष्क को ठंडक पहुँचाने के लिये क्षौर कर्म करवाना और मस्तुलिंग को गर्मी पहुँचाने के लिये गोखुरके परिमाण के बाल रखना आवश्यक होता है।

बालकुचालक हैं, अत: चोटी के लम्बे बाल बाहर की अनावश्यक गर्मी या ठंडक से मस्तुलिंग की रक्षा करते हैं। 

शिखा रखने के अन्य निम्न लाभ बताये गये हैं।
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
१ शिखा रखने तथा इसके नियमों का यथावत् पालन करने से सद्‌बुद्धि , सद्‌विचारादि की प्राप्ति होती हैं।

२ आत्मशक्ति प्रबल बनती हैं।

३ मनुष्य धार्मिक , सात्विक व संयमी बना रहता हैं।

४ लौकिक - पारलौकिक कार्यों मे सफलता मिलती हैं।

५सभी देवी देवता मनुष्य की रक्षा करते हैं।

६ सुषुम्ना रक्षा से मनुष्य स्वस्थ, बलिष्ठ, तेजस्वी और दीर्घायु होता हैं।

७ नेत्र्ज्योति सुरक्षित रहती हैं।

इस प्रकार धार्मिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक सभी दृष्टियों से शिखा की महत्ता स्पष्ट होती हैं। परंतु आज हिन्दू लोग पाश्चात्योंके चक्कर में पड़कर फैशनेबल दिखने की होड़ में शिखा नहीं रखते व अपने ही हाथों अपनी संस्कृति का त्याग कर डालते हैं।

लोग हँसी उड़ाये, पागल कहे तो सब सह लो पर धर्म का त्याग मत करो। मनुष्य मात्र का कल्याण चाहने वाली अपनी हिन्दू संस्कृति नष्ट हो रही हैं। हिन्दु स्वयं ही अपनी संस्कृति का नाश करेगा तो रक्षा कौन करेगा।

वेद में भी शिखा रखने का विधान कई स्थानों पर मिलता है,देखिये।

शिखिभ्यः स्वाहा (अथर्ववेद १९-२२-१५)

अर्थ👉 चोटी धारण करने वालों का कल्याण हो।

यशसेश्रियै शिखा।-(यजु० १९-९२)
अर्थ 👉 यश और लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए सिर पर शिखा धारण करें।

याज्ञिकैंगौर्दांणि मार्जनि गोक्षुर्वच्च शिखा। (यजुर्वेदीय कठशाखा)

अर्थात्👉  सिर पर यज्ञाधिकार प्राप्त को गौ के खुर के बराबर(गाय के जन्में बछड़े के खुर के बराबर) स्थान में चोटी रखनी चाहिये।

केशानां शेष करणं शिखास्थापनं।
केश शेष करणम् इति मंगल हेतोः ।। sabhar dev sharma Facebook wall
〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

Read more

बद्रीनाथ धाम का ब्रह्मकपाल तीर्थ

0

ब्रह्मकपाल तीर्थ का महत्त्व
〰〰🌼〰〰🌼〰〰
बद्रीनाथ धाम का ब्रह्मकपाल तीर्थ गया से आठ गुना फलदायी है।

पिंड दान के लिए भारतवर्ष क्या दुनियाँ भर से हिंदू  प्रसिद्ध गया पहुँचते हैं, लेकिन *एक तीर्थ ऐसा भी है जहाँ पर किया पिंडदान गया से भी आठ गुणा फलदायी है।*
चारो धामों में प्रमुख उत्तराखंड के बदरीनाथ के पास स्थित ब्रह्माकपाल के बारे में मान्यता है कि यहाँ पर पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को नरकलोक से मुक्ति मिल जाती है। स्कंद पुराण में ब्रह्मकपाल को गया से आठ गुणा अधिक फलदायी पितरकारक तीर्थ कहा गया है।
सृष्टि की उत्पत्ति के समय जब तीन देवों में ब्रह्मा जी, अपने द्वारा उत्तपत्तित कन्या के रुप पर मोहित हो गए थे, उस समय भोलेनाथ ने गुस्से में आकर ब्रह्मा के सिरों में से एक को त्रिशूल के काट दिया था। 
इस प्रकार शिव पर ब्रह्म हत्या का पाप लग गया था और वह कटा हुआ सिर शिवजी के हाथ पर चिपक गया था। ब्रह्मा की हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए जब भोलेनाथ पूरी पृथ्वी लोक के भ्रमण पर गए परन्तु कहीं भी ब्रह्म हत्या से मुक्ति नही मिली।
भृमण करते करते शिवजी बदरीनाथ पहुँचे वहाँ पर ब्रह्मकपाल शिला पर शिवजी के हाथ से ब्रह्माजी का सिर जमीन पर गिर गया और शिवजी को ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली। तभी से यह स्थान ब्रह्मकपाल के रुप में प्रसिद्ध हुआ। ब्रह्मकपाल शिला के नीचे ही ब्रह्मकुण्ड है जहाँ पर ब्रह्मा जी ने तपस्या की थी।
शिवजी ने ब्रह्महत्या से मुक्त होने पर इस स्थान को वरदान दिया कि यहाँ पर जो भी व्यक्ति श्राद्ध करेगा उसे प्रेत योनी में नहीं जाना पड़ेगा एवं उनके कई पीढ़ियों के पितरों को मुक्ति मिल जाएगी। पुराणों में बताया गया है कि उत्तराखंड की धरती पर भगवान बद्रीनाथ के चरणों में बसा है ब्रह्म कपाल। अलकनंदा नदी ब्रह्मकपाल को पवित्र करती हुई यहाँ से प्रवाहित होती है। इस स्थान के विषय में मान्यता है कि इस स्थान पर जिस व्यक्ति का श्राद्ध कर्म होता है उसे प्रेत योनी से तत्काल मुक्ति मिल जाती है और भगवान विष्णु के परमधाम में उसे स्थान प्राप्त हो जाता है। जिस व्यक्ति की अकाल मृत्यु होती है उसकी आत्मा व्याकुल होकर भटकती रहती है। ब्रह्म कपाल में अकाल मृत्यु प्राप्त व्यक्ति का श्राद्ध करने से आत्मा को तत्काल शांति और प्रेत योनी से मुक्ति मिल जाती है।
भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के समाप्त होने के बाद पाण्डवों को ब्रह्मकपाल में जाकर पितरों का श्राद्ध करने का निर्देश दिया था। इसलिये भगवान श्रीकृष्ण कीआज्ञा मानकर पाण्डव बद्रीनाथ की शरण में गए और ब्रह्मकपाल तीर्थ में पितरों एवं युद्ध में मारे गए सभी लोगों के लिए श्राद्ध किया। पुराणों में बताया गया है कि उत्तराखंड की भूमि पर बद्रीनाथ धाम में बसा है ब्रह्मकपाल तीर्थ, जिसको अलकनंदा नदी पवित्र करती हुई प्रवाहित होती है। इस स्थान के विषय में मान्यता है कि इस स्थान पर जिस व्यक्ति का श्राद्ध कर्म होता है उसे प्रेत योनि से तत्काल मुक्ति मिल जाती है और वह भगवान विष्णु के परमधाम में स्थान प्राप्त करता है। जिस व्यक्ति की अकाल मृत्यु होती है और उसकी आत्मा व्याकुल होकर भटकती रहती है उस व्यक्ति का श्राद्ध ब्रह्मकपाल तीर्थ पर करने से उस की आत्मा को तत्काल शान्ति मिलती है और प्रेत योनि से मुक्ति मिल जाती है।
〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰sabhar dev sharma Facebook wall

Read more

मंगलवार, 3 अगस्त 2021

दुनिया कितनी ख़ूबसूरत है ओलंपिक से सीखें

0

दुनिया कितनी ख़ूबसूरत है ओलंपिक से सीखें

केन्या  के सुप्रसिद्ध धावक अबेल मुताई ओलंपिक प्रतियोगिता के अंतिम राउंड में दौड़ते वक्त अंतिम लाइन से एक मीटर दूर रह गये थे। उनके सभी प्रतिस्पर्धी पीछे थे। अबेल ने स्वर्ण पदक लगभग जीत ही लिया था, इतने में कुछ गलतफहमी के कारण वे अंतिम रेखा समझकर एक मीटर पहले ही रुक गए। उनके पीछे आने वाले स्पेन के इव्हान फर्नांडिस ने देखा अंतिम रेखा समझ नहीं आने की वजह से वह पहले ही रुक गए। उन्होंने  चिल्लाकर अबेल को आगे जाने के लिए कहा। लेकिन स्पेनिश नहीं समझने की वजह से वह नहीं हिले।आखिर में इव्हान ने उसे धकेलकर अंतिम रेखा तक पहुंचा दिया। इस कारण अबेल का प्रथम तथा इव्हान का दूसरा स्थान आया। 
पत्रकारों ने इव्हान से पूछा, तुमने ऐसा क्यों किया ? मौका मिलने के बावजूद तुमने प्रथम क्रमांक क्यों गंवाया ?
इव्हान ने कहा मेरा सपना है हम एक  दिन ऐसी मानवजाति बनाएंगे जो एक दूसरे को मदद करेगी न कि उसकी भूल से फायदा उठाएगी। और मैंने प्रथम स्थान नहीं गंवाया।" 
पत्रकार ने फिर कहा लेकिन तुमने केनियन प्रतिस्पर्धी को धकेलकर आगे लाया।
इसपर इव्हान ने कहा वह प्रथम था ही। यह प्रतियोगिता उसी की थी।
पत्रकार ने फिर कहा, लेकिन तुम स्वर्ण पदक जीत सकते थे।
इव्हान ने कहा, उस जीतने का क्या अर्थ होता। मेरे पदक को सम्मान मिलता ? मेरी मां ने फिर मुझे क्या कहा होता ? 
संस्कार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आगे जाते हैं। मैंने अगली पीढ़ी को क्या दिया होता ? दूसरों की दुर्बलता या अज्ञान का फायदा न उठाते हुए उनको मदद करने की सीख मेरी मां ने मुझे दी है।

...और यह दूसरी कहानी

टोक्यो ओलंपिक में पुरुषों की हाई जम्प फाइनल में इटली के जियानमारको ताम्बरी का सामना क़तर के मुताज़ इसा बर्शिम से हुआ। दोनों ने 2.37 मीटर की छलांग लगाई और बराबरी पर रहे। उसके बाद ओलंपिक अधिकारियों ने उनमें से प्रत्येक को तीन और प्रयास दिए, लेकिन वे 2.37 मीटर से अधिक तक नहीं पहुंच पाए।
उन दोनों को एक और प्रयास दिया गया, लेकिन उसी वक़्त टाम्पबेरी पैर में गंभीर चोट के कारण अंतिम प्रयास से पीछे हट गए। यह वह क्षण था जब मुताज़ बरशिम के सामने कोई दूसरा विरोधी नहीं था औऱ उस पल वह आसानी से अकेले सोने के क़रीब पहुंच सकते थे!

लेकिन बर्शिम के दिमाग में कुछ घूम रहा था औऱ फ़िर कुछ सोचकर उसने एक अधिकारी से पूछा, "अगर मैं भी अंतिम प्रयास से पीछे हट जाऊं तो क्या हम दोनों के बीच गोल्ड मैडल साझा किया जा सकता है?" 

कुछ देर बाद एक आधिकारी जाँच कर पुष्टि करता है और कहता है "हाँ बेशक गोल्ड आप दोनों के बीच साझा किया जाएगा"। 

बर्शिम के पास और ज्यादा सोचने के लिए कुछ नहीं था । उसने आखिरी प्रयास से हटने की घोषणा की।

यह देख इटली का प्रतिद्वन्दी ताम्बरी दौड़ा और मुताज़ बरसीम को गले लगा कर चिल्लाया ! दोनों भावुक होकर रोने लगे ।

लोगों ने जो देखा वह खेलों में प्यार का एक बड़ा हिस्सा था जो दिलों को छूता है। यह अवर्णनीय खेल भावना को प्रकट करता है जो धर्मों, रंगों और सीमाओं को अप्रासंगिक बना देता है !!!

इसी दुनिया मे लोग सुख दुख साझा करने से डरते है और कुछ महान लोग गोल्ड मेडल तक साझा कर रहे हैं।
इंसानका किरदार किसी भी मैडल से बड़ा है। sabhar mahesh pratap singh zonal coordinator paprika.com

Read more

 
Design by ThemeShift | Bloggerized by Lasantha - Free Blogger Templates | Best Web Hosting