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सोमवार, 5 जुलाई 2021

ऋषि महत्व और उनके योगदान

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----------------------महत्वपूर्ण जानकारी-----------------
#अंगिरा_ऋषि 👉 ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे। उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी।

#विश्वामित्र_ऋषि 👉 गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे। विश्वामित्र की परंपरा पर चलने वाले ऋषियों ने उनके नाम को धारण किया। यह परंपरा अन्य ऋषियों के साथ भी चलती रही।

#वशिष्ठ_ऋषि 👉 ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक वशिष्ठ सप्तऋषियों में से एक थे। उनकी पत्नी अरुंधती वैदिक कर्मो में उनकी सहभागी थीं।

#कश्यप_ऋषि 👉 मारीच ऋषि के पुत्र और आर्य नरेश दक्ष की १३ कन्याओं के पुत्र थे। स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, इनसे देव, असुर और नागों की उत्पत्ति हुई।

#जमदग्नि_ऋषि 👉 भृगुपुत्र यमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के १६ मंत्रों की रचना की है। केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे।

#अत्रि_ऋषि 👉 सप्तर्षियों में एक ऋषि अत्रि ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अधिकांश सूत्रों के ऋषि थे। वे चंद्रवंश के प्रवर्तक थे। महर्षि अत्रि आयुर्वेद के आचार्य भी थे।

#अपाला_ऋषि 👉 अत्रि एवं अनुसुइया के द्वारा अपाला एवं पुनर्वसु का जन्म हुआ। अपाला द्वारा ऋग्वेद के सूक्त की रचना की गई। पुनर्वसु भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य हुए।

#नर_नारायण_ऋषि 👉  ऋग्वेद के मंत्र द्रष्टा ये ऋषि धर्म और मातामूर्ति देवी के पुत्र थे। नर और नारायण दोनों भागवत धर्म तथा नारायण धर्म के मूल प्रवर्तक थे।

#पराशर_ऋषि 👉 ऋषि वशिष्ठ के पुत्र पराशर कहलाए, जो पिता के साथ हिमालय में वेदमंत्रों के द्रष्टा बने। ये महर्षि व्यास के पिता थे।

#भारद्वाज_ऋषि 👉 बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज ने 'यंत्र सर्वस्व' नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें विमानों के निर्माण, प्रयोग एवं संचालन के संबंध में विस्तारपूर्वक वर्णन है। ये आयुर्वेद के ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे।

आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान सात संतों के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है। प्रत्येक मनवंतर में सात सात ऋषि हुए हैं। यहां प्रस्तुत है वैवस्तवत मनु के काल में जन्में सात महान ‍ऋषियों का संक्षिप्त परिचय।

#वेदों_के_रचयिता_ऋषि 👉 ऋग्वेद में लगभग एक हजार सूक्त हैं, लगभग दस हजार मन्त्र हैं। चारों वेदों में करीब बीस हजार हैं और इन मन्त्रों के रचयिता कवियों को हम ऋषि कहते हैं। बाकी तीन वेदों के मन्त्रों की तरह ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना में भी अनेकानेक ऋषियों का योगदान रहा है। पर इनमें भी सात ऋषि ऐसे हैं जिनके कुलों में मन्त्र रचयिता ऋषियों की एक लम्बी परम्परा रही। ये कुल परंपरा ऋग्वेद के सूक्त दस मंडलों में संग्रहित हैं और इनमें दो से सात यानी छह मंडल ऐसे हैं जिन्हें हम परम्परा से वंशमंडल कहते हैं क्योंकि इनमें छह ऋषिकुलों के ऋषियों के मन्त्र इकट्ठा कर दिए गए हैं। 

वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है:- १.वशिष्ठ, २.विश्वामित्र, ३.कण्व, ४.भारद्वाज, ५.अत्रि, ६.वामदेव और ७.शौनक। 

पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :- 

वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत।
विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।।

 अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।

इसके अलावा पुराणों की अन्य नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है।

महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं। एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली में पांच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं। कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है। यहां प्रस्तुत है वैदिक नामावली अनुसार सप्तऋषियों का परिचय।

१. #वशिष्ठ 👉 राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।

२. #विश्वामित्र 👉 ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।

माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है। 

३. #कण्व 👉 माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।

४. #भारद्वाज 👉 वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी।

ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में १० ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम 'रात्रि' था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं। ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के ७६५ मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के २३ मन्त्र मिलते हैं। 'भारद्वाज-स्मृति' एवं 'भारद्वाज-संहिता' के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। ऋषि भारद्वाज ने 'यन्त्र-सर्वस्व' नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने 'विमान-शास्त्र' के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।

५. #अत्रि 👉 ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था।

अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।

६. #वामदेव 👉 वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं। 

७. #शौनक 👉 शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे। 

फिर से बताएं तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है।

इसके अलावा मान्यता हैं कि #अगस्त्य, #कष्यप, #अष्टावक्र, #याज्ञवल्क्य, #कात्यायन, #ऐतरेय, #कपिल, #जेमिनी, #गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है।

दिनांक - ०५.०७.२०२१
---#राज_सिंह---

Vedic science

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गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

अपनी आध्यात्मिक अवस्था को कैसे जाने

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प्रत्येक साधक की कुछ दिन ध्यान साधना करने के बाद यह जानने की इच्छा होती हैं 
की मेरी कुछ आध्यात्मिक प्रगति हुई या नहीं और आध्यात्मिक प्रगति को नापने का मापदंड है  आपका अपना चित्त,आपका अपना चित्त कितना शुद्ध और पवित्र हुआ है  वही आपकी आध्यात्मिक स्थिति को दर्शाता हैं ।अब आपको भी अपनी आध्यात्मिक प्रगति जानने की इच्छा हैं तो आप भी इन निम्नलिखित चित्त के स्तर से अपनी स्वयम की आध्यात्मिक स्थिति को जान सकते हैं ,बस अपने चित्त का प्रामाणिकता के साथ ही अवलोकन करें यह अत्यंत आवश्यक हैं ।

1 ) दूषित चित्त --: चित्त का सबसे निचला स्तर हैं  दूषित चित्त  इस स्तर पर साधक सभी के दोष ही खोजते रहता हैं  दूसरा  सदैव सबका बुरा कैसे किया जाए सदैव इसी का विचार करते रहता है  दूसरों की प्रगति से सदैव ईर्ष्या करते रहता हैं  नित्य नए-नए उपाय खोजते रहता हैं की किस उपाय से हम दुसरे को नुकसान पहुँचा सकते हैं  सदैव नकारात्मक बातों से  नकारात्मक घटनाओं से  नकारात्मक व्यक्तिओं से यह  चित्त सदैव भरा ही रहता हैं 

2 ) भूतकाल में खोया चित्त --: एक चित्त एसा होता हैं 
 वः सदैव भूतकाल में ही खोया हुआ होता हैं | वह सदैव भूतकाल के व्यक्ति और भूतकाल की घटनाओं में ही लिप्त रहता हैं  जो भूतकाल की घटनाओं में रहने का इतना आधी हो जाता हैं की उसे भूतकाल में रहने में आनंद का अनुभव होता हैं 

3 ) नकारात्मक चित्त --: इस प्रकार का चित्त सदैव बुरी संभावनाओं से ही भरा रहता हैं  सदैव कुछ-न कुछ बुरा ही होगा यह वह चित्त चित्तवाला मनुष्य सोचते रहता हैं  यह अति भूतकाल में रहने के कारण होता हैं क्योंकि अति भूतकाल में रहने से वर्त्तमान काल खराब हो जाता हैं 

 4 ) सामान्य चित्त : यह चित्त एक सामान्य प्रकृत्ति का होता हैं इस चित्त में अच्छे  बुरे  दोनों ही प्रकार के विचार आते हैं  यह जब अच्छी संगत में होता हैं  तो इसे अच्छे विचार आते हैं और जब यह बुरी संगत में रहता हैं तब उसे बुरे विचार आते हैं  यानी इस चित्त के अपने कोई विचार नहीं होते जैसी अन्य चित्त की संगत मिलती हैं  वैसे ही उसे विचार आते हैं  वास्तव में वैचारिक प्रदुषण के कारण नकारात्मक विचारों के प्रभाव में ही यह ‘सामान्य चित्त’ आता हैं 

 5 ) निर्विचार चित्त : साधक जब कुछ  साल  तक ध्यान साधना करता हैं  तब यह निर्विचार चित्त की स्थिति साधक को प्राप्त होती है  यानी उसे अच्छे भी विचार नहीं आते और बुरे भी विचार नहीं आते  उसे कोई भी विचार ही नहीं आते  वर्त्तमान की किसी परिस्थितिवश अगर चित्त कहीं गया तो भी वह क्षणिकभर ही होता हैं  जिस प्रकार से बरसात के दिनों में एक पानी का बबुला एक क्षण ही रहता हैं  बाद में फुट जाता हैं  वैसे ही इनका चित्त कहीं भी गया तो एक क्षण के लिए जाता हैं  बाद में फिर अपने स्थान पर आ जाता हैं  यह आध्यात्मिक स्थिति की प्रथम पादान  हैं होती हैं क्योकि फिर कुछ साल तक अगर इसी स्थिति में रहता हैं तो चित्त का सशक्तिकरण होना प्रारंभ हो जाता हैं और साधक एक सशक्त चित्त का धनि हो जाता हैं 

 6 ) दुर्भावनारहित चित्त : चित्त के सशक्तिकरण के साथ-साथ चित्त में निर्मलता आ जाती हैं  और बाद में चित्त इतना निर्मल और पवित्र हो जाता हैं कि चित्त में किसी के भी प्रति बुरा भाव ही नहीं आता हैं  चाहे सामनेवाला का व्यवहार उसके प्रति कैसा भी हो  यह चित्त की एक अच्छी दशा होती हैं 

 7 ) सद्भावना भरा चित्त : ऐसा चित्त बहुत ही कम लोगों को प्राप्त होता हैं  इनके चित्त में सदैव विश्व के सभी प्राणिमात्र के लिए सदैव सद्भावना ही भरी रहती हैं  ऐसे चित्तवाले मनुष्य  संत प्रकृत्ति के होते हैं  वे सदैव सभी के लिए अच्छा  भला ही सोचते हैं  ये सदैव अपनी ही मस्ती में मस्त रहते हैं  इनका चित्त कहीं भी जाता ही नहीं हैं  ये साधना में लीन रहते हैं 

 8 ) शून्य चित्त -: यह चित्त की सर्वोत्तम दशा हैं  इस स्थिति में चित्त को एक शून्यता प्राप्त हो जाती हैं  यह चित्त एक पाइप जैसा होता हैं  जिसमें साक्षात परमात्मा का चैतन्य सदैव बहते ही रहता हैं  परमात्मा की  करूणा की शक्ति सदैव ऐसे शून्य चित्त से बहते ही रहती हैं  यह चित्त कल्याणकारी होता हैं  यह चित्त किसी भी कारण से किसी के भी ऊपर आ जाए तो भी उसका कल्याण हो जाता हैं  इसीलिए ऐसे चित्त को कल्याणकारी चित्त कहते हैं  ऐसे चित्त से कल्याणकारी शक्तियाँ सदैव बहते ही रहती हैं  यह चित्त जो भी संकल्प करता हैं  वह पूर्ण हो जाता हैं  यह सदैव सबके मंगल के ही कामनाएँ करता हैं  मंगलमय प्रकाश ऐसे चित्त से सदैव निरंतर निकलते ही रहता हैं 

अब आप अपना स्वयम का  अवलोकन करें और जानें की आपकी आध्यात्मिक स्थिति कैसी हैं  आत्मा की पवित्रता का और चित्त हा बड़ा ही निकट का संबंध होता हैं  अब तो यह समझ लो की चित्तरूपी धन  लेकर हम जन्मे हैं और जीवनभर हमारे आसपास सभी चित्तचोर जो चित्त को दूषित करने वाले ही रहते हैं  उनके बीच रहकर भी हमें अपने चित्तरूपी धन को संभालना हैं  अब कैसे  सभी प्रबुध्द सूझवान और समझदार लोग है
सिध्दयोग का अभ्यास किया नही जा सकता  यह अपने आप स्वचलित-स्वघटित होता है सिद्ध योग के अभ्यास का मतलब है,हमेशा, धैर्य  समभाव- कृतज्ञता और आनंद के राज्य में रहना 

               ॐ नमः शिवाय

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बुधवार, 7 अप्रैल 2021

यह आत्मा चैतन्य है

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मुक्त है। असीम है।सभी में व्याप्त है। आत्मा को किसी भी बंधन में बांधा नहीं जा सकता शरीर तो सीमित है।

 मन बुद्धि सीमित है। यह सारी विविधता शारीरिक और मानसिक है।आत्मा में कोई विविधता नहीं तुम शरीर नहीं हूं व्यापक आत्मा हो इस कारण तुम सदैव से ही मुक्त हो यह मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है।

 इसको प्राप्त नहीं करना या तो स्वयं ही उपलब्ध है।केवल इसकी पहचान करने की आवश्यकता है। कि एवं उपभोक्ता होकर कोई ठीक से मात्र सुन ले तो घटना घट जाएगी उसी पल जन्मों-जन्मों की विस्मृति टूट जाएगी स्मरण लौट आएगा खोज करने वाला भटक जाता है।

 खोज करने से परमात्मा नहीं मिलता खोजों को छोड़ कर संसार के प्रति उदासीनता त्याग वान होकर विश्राम में स्थित हो जाना ही पा लेने का मार्ग है।

 आत्मा व्यापक है।सब में एक ही है।किंतु शरीर की विविधता के कारण अज्ञानी व्यक्ति को आत्मा की दिव्या दत्ता का संदेह हो जाता है यह मेरी आत्मा है।उसकी आत्मा अलग-अलग आत्मा आत्मा अनंत है। आदि यह अज्ञान  है।

ओ३म

पंडित महाबीर प्रसाद

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मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

आध्यात्म ज्ञान

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अध्यात्म ज्ञान धारण करने का तत्व है हम जितना अध्यात्म को धारण करते जाएंगे उतना ज्यादा ईश्वर का और सत्य का अनुभव करते जाएंगे बिना धारण किए हुए यह ज्ञान हमारे किसी काम का नहीं है ?
जैसे ठंड का महीना चल रहा है हमें ठंडी भी खूब लग रही है और हम कंबल का खूब बखान करें कंबल इतना होता है मोटा होता है बहुत गर्म करता है कंबल उड़ने वाले को ठंड नहीं लगता है कंबल में हाथ पैर साहब सीमेट लेते हैं कंबल का कितना भी बखान कर ले जब तक हम उस कंबल को अपने शरीर पर धारण नहीं करेंगे तब तक उस कंबल का कितना भी बखान कर ले वह हमारे किसी काम का होता नहीं है ठीक उसी प्रकार से ज्ञान जब तक धारण न किया जाए हमारे किसी काम का नहीं है,
कंबल को शरीर पर धारण किया जाता है , और ज्ञान को हमारे अंतःकरण पर ज्ञान रूपी प्रकाश धीरे-धीरे अंतः करण को नया प्रकाश देकर अंधकार रूपी अज्ञान को नष्ट कर देता है जिससे जीवन की सत्यता और सार्थकता का अनुभव होता है ?
इसलिए महापुरुषों ने कहा है बाहर से कितना भी ज्ञान ले लो वह ज्ञान जब तक हमारे अंतःकरण में प्रकट नहीं होगा तब तक बाहरी ज्ञान से काम चलेगा नहीं मनुष्य जीवन के कल्याण के लिए ज्ञान को अंतःकरण में धारण करना ही पड़ेगा

शुद्ध आध्यात्म ज्ञान

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वास्तविक स्वरूप

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मनुष्य का वास्तविक स्वरूप उसकी आत्मा है। किन्तु मन को ही अपना स्वरूप मान लेता है। अपने को चैतन्य स्वरूप मानने पर साधक चिदानंद स्वरूप में लीन हो जाता है।

जिस प्रकार आकाश भी शून्य स्वभाव है। तो भी उसकी सत्ता को स्वीकार किया गया है। इसी प्रकार वह परमात्मा भी शून्य स्वभाव वाला होते हुवे भी उसकी सत्ता है। उसे कई प्रयोगों व प्रमाणों से सिद्ध किया जा सकता है। वह किसी भी प्रकार की आकृति से रहित होते हुवे भी मिथ्या नही है।

वही ईस्वर विस्वाब्यापी चैतन्य है जो अपने भीतर आत्मा रूप में अवस्थित है। शरीर मे जो पीड़ा होती है। वह उस आत्मा चैतन्य के कारण ही होती है। उसकी उपस्थिति में पीड़ा नही हो सकती अतः पीड़ा का अनुभव करने वाली चेतना ही है।

साधक जब अन्तर्मुखी हो जाता है। तो उसे आत्मस्वरूप का ज्ञान हो जाता है। ये सारी इच्छाएं वासनाये आदि केवल मन की उपज है। मन के शांत होने पर योगी आत्मस्वरूप हो जाता है।

यह आत्मा ही ब्रह्म है। अयमात्मा ब्रह्म ऐसी भावना दृढ़ हो जाने पर योगी को परमार्थ तत्व का ज्ञान हो जाता है।

ओउम

पंडित महाबीर प्रसाद

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रविवार, 4 अप्रैल 2021

कर्म और प्रतिकर्म🌹

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हम किसे कर्म समझते हैं? हम प्रतिकर्म को कर्म समझे हुए हैं, रिएक्शन को एक्शन समझे हुए हैं। किसी ने गाली दी आपको, और आपने भी उत्तर में गाली दी। आप जो गाली दे रहे हैं, वह कर्म न हुआ; वह प्रतिकर्म हुआ, रिएक्शन हुआ। किसी ने प्रशंसा की, और आप मुस्कुराए, आनंदित हुए; वह आनंदित होना कर्म न हुआ; प्रतिकर्म हुआ, रिएक्शन हुआ।

आपने कभी कोई कर्म किया है! या प्रतिकर्म ही किए हैं?

चौबीस घंटे, जन्म से लेकर मृत्यु तक, हम प्रतिकर्म ही करते हैं; हम रिएक्ट ही करते हैं। हमारा सब करना हमारे भीतर से सहज-जात नहीं होता, स्पांटेनियस नहीं होता। हमारा सब करना हमसे बाहर से उत्पादित होता है, बाहर से पैदा किया गया होता है।

किसी ने धक्का दिया, तो क्रोध आ जाता है। किसी ने फूलमालाएं पहनाईं, तो अहंकार खड़ा हो जाता है। किसी ने गाली दी, तो गाली निकल आती है। किसी ने प्रेम के शब्द कहे, तो गदगद हो प्रेम बहने लगता है। लेकिन ये सब प्रतिकर्म हैं।

ये प्रतिकर्म वैसे ही हैं, जैसे बटन दबाई और बिजली का बल्ब जल गया; बटन बुझाई और बिजली का बल्ब बुझ गया। बिजली का बल्ब भी सोचता होगा कि मैं कर्म करता हूं जलने का, बुझने का। लेकिन बिजली का बल्ब जलने-बुझने का कर्म नहीं करता है। कर्म उससे कराए जाते हैं। बटन दबती है, तो उसे जलना पड़ता है। बटन बुझती है, तो उसे बुझना पड़ता है। यह उसकी स्वेच्छा नहीं है।

इसको ऐसा लें, किसी ने आपको गाली दी। और अगर आप गाली का उत्तर देते हैं, तो थोड़ा सोचें, यह गाली का उत्तर आपने दिया या देना पड़ा? अगर दिया, तो कर्म हो सकता है; देना पड़ा, तो प्रतिकर्म होगा।

आप कहेंगे, दिया, चाहते तो न देते। तो फिर चाहकर कोशिश करके देखें, तब आपको पता चलेगा। हो सकता है, ओंठों को रोक लें, तो भीतर गाली दी जाएगी। तब आपको पता चलेगा, गाली मजबूरी है; बटन दबा दी है किसी ने। और अगर कोई गाली दे, और आपके भीतर गाली न उठे, तो कर्म हुआ। तो आप कह सकते हैं, मैंने गाली न देने का कर्म किया।

कर्म का अर्थ है, सहज। प्रतिकर्म का अर्थ है, प्रेरित, इंस्पायर्ड। कारण है जहां बाहर, और कर्म आता है भीतर से, वहां कर्म नहीं है।

हम चौबीस घंटे प्रतिकर्म में ही जीते हैं। बुद्ध, या महावीर, या कृष्ण, या क्राइस्ट जैसे लोग कर्म में जीते हैं। उनके जीवन में प्रतिकर्म खोजे से भी नहीं मिलेगा।

प्रतिकर्म गुलामी है, स्लेवरी है; दूसरा आपसे करवा लेता है। जब दूसरा आपसे कुछ करवा लेता है, तो आप गुलाम हैं, मालिक नहीं। कर्म तो वे ही कर सकते हैं, जो गुलाम नहीं हैं।

☘️💞☘️ओशो ☘️💞☘️
गीता-दर्शन – भाग दो
वर्ण-व्यवस्था का मनोविज्ञान
(अध्याय ४) प्रवचन—छठवां

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शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

स्थिर अवस्था चित्त की

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दो विचारो के मध्य जो अवकाश है। वह अवकाश ही उपयोगी है। वही स्थिर अवस्था है। जिस पर ध्यान केंद्रित करने से चेतनतत्व की अनुभूति हो जाती है।

जब तक पानी मे हलचल होती है। तबतक चन्द्रमा का बिम्ब नही दिखाई देता इसी प्रकार मन की चंचलता से ही आत्मा का बिम्ब नही दिखाई देता है।

चित्त जब शून्य अवस्था मे पहुच जाता है। तभी यह ज्ञात होता है। कि क्रिया का कारण भी वही है तथा जो ज्ञान व ज्ञेय है। उसका ज्ञाता भी वही है। ऐसा ज्ञान हो जाना ही परम् उपलब्धि है।

चित्त की व्रती ही ऐसी है। कि वह अपनी इच्छित वस्तु की ओर ही आकृष्ट होती है। उस समय वह दूसरी वस्तु की ओर उसका ध्यान ही नही जाता जब उसे कोई इच्छित वस्तु नही मिलती तभी वह ब्यर्थ और अनुपयोगी को ही उपयोगी समझकर उसकी ओर आकर्षित होता है।

अपने ईस्ट के ध्यान में लगने पर वह सांसारिक पदार्थो की और आकर्षित होता ही नही जब चित्त अपने ईस्ट में इस प्रकार स्थिर हो जाये जैसे पवन रहित स्थान में दीपक की लो स्थिर रहती है। तो इसी अवस्था मे योगी परमानंद की अवस्था प्राप्त होती है।इसी को ब्रह्मस्वरूप होना कहते है।

मन के कारण ही संसार की सभी वस्तुओ में भेद की प्रतीति होती हैं। मन अभेद को नही जान सकता आत्मा के तल पर अभेद का ज्ञान होता है।

मनुस्य बाहरी विषयो में आनंद की खोज करता है। किंतु वह वास्तविक आनंद नही है वास्तविक आनंद तो स्वयं के भीतर ही है। जो स्वयं की आत्मा है।

मनुस्य को आनंद की अनुभूति होती है। वह उस चेतन आत्मा के कारण ही होती है। क्योंकि आत्मा स्वयं आनंद स्वरूप है।

शरीरो में भेद होने से आत्म चेतना में भेद नही हो जाता वह सबमे समान रूप से ब्याप्त है। ऐसा ज्ञान हो जाना ही परम् सिद्धि है।

ओउम

पंडित महाबीर प्रसाद

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